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डिजिटल त्यौहार

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पुराने ज़माने से ही यह मान्यता है कि हमारे हाथों में भगवान का वास होता है, इसीलिए लोग प्रातःकाल दिन की शुरुआत अपने 'हाथ' के दर्शन करते थे, आजकल लोग अपने मोबाइल के दर्शन करके दिन की डिजिटल-मय शुरुआत करते हैं।

निस्संदेह, मोहित ने भी अपने दिन की डिजिटल-मय शुरुआत की थी, इसीलिए सुबह से ही कुछ परेशान सा लग रहा था। मोहित बार-बार अपना मोबाइल उठाता, कुछ देखता, फिर झुंझलाकर मोबाइल रख देता, बहुत देर से यही सिलसिला चल रहा था।

दरअसल, पिछली रात मोहित ने एक उच्च गुणवत्ता वाले कैमरे से ली हुई एक तस्वीर को दर्जनों फ़िल्टर की सहायता से उच्चतम गुणवत्ता की चरम-सीमा पर पहुँचाकर ,इंस्टाग्राम पर पोस्ट किया था। और, रात-भर में ऐसी अप्रतीम तस्वीर पर सिर्फ 27 लाइक्स!! सच में आज के समय में इससे बड़ी कोई पीड़ाजनक बात नही हो सकती, मोहित को अपने 790 फॉलोवर्स का होना व्यर्थ सा लग रहा था। मोहित सोच रहा था कि ऐसे दोस्त किस काम के जो दोस्त की फोटो पर कमेंट न कर सके और एक लाइक न बढ़ा सके !!

इसी बीच फ़ोन में बीप की आवाज के साथ एक सन्देश आता है कि '"BB ki Vines" की ओर से नई वीडियो', इस तनावग्रस्त माहौल में यह एक राहत की बात थी।
वैसे आज दीवाली है, लेकिन मोहित को इस बात की कोई सुध नही है, वह अपने मोबाइल में ही व्यस्त है। तभी पिताजी की आवाज आती है, “मोहित, कब तक मोबाइल में घुसे रहोगे? आखिर, इस मोबाइल के बाहर भी एक दुनिया है!”
मोबाइल में ही नज़रें गड़ाए हुए अनमने भाव से मोहित बोला, “ क्या बात है पिताजी, क्या काम है ?”

पिताजी बोले - “बेटा, आज दिवाली है ना, चलो शर्मा जी के यहाँ दिवाली की बधाई देके आते है!” 

मोहित बोला -  “क्या पिताजी, इतनी सी बात के लिए बाहर क्या जाना वह भी इतने प्रदूषण में, बाहर तो सांस लेना भी मुश्किल है। बधाई तो हम व्हाट्सएप्प से भी भेज सकते है, या फिर आप फेसबुक पर पोस्ट करके अपने सभी दोस्तों को टैग कर दीजिये वैसे भी आपके सारे दोस्त फेसबुक पर है ही।”

पिताजी बोले- “लेकिन बेटा, त्यौहार तो हमें अपने दोस्तों के साथ मिलकर ही मनाने चाहिए, यही तो त्योहारों का उद्देश्य होता है कि सब मिलजुल कर ख़ुशियाँ बाँटे। यही तो हमारी संस्कृति है।”

मोहित बोला- “ पिताजी, अब पहले की तरह नही रहा सब , अब तो सारे त्यौहार हम ऐसे ही मनाते है, संदेश भेजकर या फिर एक-दूसरे को टैग करके। इससे समय कितना बचता है और हम हर किसी तक शुभकामनायें भेज पाते है। और, अब तो हम सिर्फ होली, दीवाली, दशहरा ही नही बल्कि मदर्स डे, फादर्स डे, वैलेंटाइन डे, हैलोवीन  जैसे दुनिया भर के त्यौहार भी हम मनाते है सोशल मीडिया पर; पहले कहाँ होता था यह सब।”

पिताजी ने मोहित की बात सुनी, एक गहरी सांस ली और थोड़ा मुस्कुराए और बोले-- “बेटा, बात तो तुम्हारी सही है लेकिन क्या करें , ये मिठाइयां व्हाट्सएप्प से नही भेज सकते ना, इसीलिए चलना तो पड़ेगा।”

Posted by Saurabh Tiwari

एक राह अकेली सी, रूकती है न चलती है।