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झूठ का सच्चा स्वरूप: विज्ञापन

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विज्ञापन बाज़ार निर्माण का अभिन्न घटक है। विज्ञापन का मूल तत्व यह माना जाता है कि जिस वस्तु का विज्ञापन किया जा रहा है उसे लोग पहचान जाएँ और उसको अपना लें। परन्तु आजकल के विज्ञापन का इस्तेमाल अपने को दूसरे से बेहतर दिखाने के लिए किया जाने लगा है। जब भी मेरा ध्यान इसके इतिहास की ओर जाता है,मैं दुविधा में पड़ जाता हूं कि इसका व्याख्यान कहां से शुरू करूँ।फिर जब अपने भारतीय संदर्भ में जाकर कुछ पन्ने पीछे की ओर पलटता हूं। तब मेरा कार्य थोड़ा आसान सा हो जाता है। ऐसा लगता है कि हमारे यहाँ वस्तु निर्माताओं के बीच बाज़ार में विज्ञापन के स्वरूप में तीव्र परिवर्तन की लड़ाई आज़ादी के बाद हुई ।
        बात तब कि है जब हम आज़ाद हुए हीं थे।स्वतंत्रता के उपरांत महज 10-15 वर्षों में भारतीय वस्तु निर्माताओं की संख्या अच्छी ख़ासी बढ़ी। बाजार में हर प्रकार के वस्तुओं के विकल्प भले हीं कम थे परंतु उपभोक्ताओं को रिझाने के तरीके कम न थे। दरअसल उपभोक्ताओं को रिझाने के नए प्रक्रम शुरु हो चुके थे। तब ग्लूकोज बिस्कुट का विज्ञापन अमज़द खान करते थे। वाक्यांश था 'ग्लूकोज-डी स्वाद एवं सेहत के लिए'। 1975 में शोले फ़िल्म के आने के बाद इस बिस्कुट के विज्ञापन के साथ अमज़द खान नए रूप में आये। अब वाक्यांश हो गया- 'गब्बर की पसंद ग्लूकोज-डी'। ऐसे जैसे-जैसे हम उत्पाद बदलते जाएंगे वैसे-वैसे विज्ञापन का बदलता स्वरूप नज़र आएगा। वाक्यांश उत्पाद के साथ जन्म लेते हैं और समय के साथ साथ बदलने के बाद झूठ से भी काफी आगे निकल कर भ्रम की स्तिथि पैदा कर देते हैं। ये सिर्फ इन्हीं वस्तुओं तक सीमित नही है । शिक्षा जगत,बैंकिंग क्षेत्र यहां तक कि विज्ञापन करने वाले भी अपना विज्ञापन करने में पीछे नहीं हैं।
      आज वाक्यांश की जगह नाट्यांश ने लेकर विज्ञापन जगत को और भी प्रभावी बना दिया है। प्रत्येक निर्माता समूह अपने वस्तुओं के लिए लगभग एक सामान विषय हीं चुन रहे हैं। जैसे खाद्य पदार्थ एवं सौंदर्य प्रसाधन के लिए आज सिर्फ दो विषय महत्वपूर्ण हो गया है-स्वास्थ्य एवं कामुकता। चॉकलेट खाने भर से प्यार हो जाना, कुछ विशिष्ट फल के स्वाद युक्त पेय के सिर्फ पीने भर से तृप्त हो जाना,इत्र लगाने भर से कामातुर युवतियों का व्यक्ति के शरीर से चिपक जाना आदि विज्ञापन के झूठ को प्रपंच में परिवर्तित होने का प्रतीक हीं तो है।
                                "ऐसा बिल्कुल नहीं है कि विज्ञापन अनावश्यक है,          
                                  आवश्यक है परंतु इसके तरीके विचारणीय हैं।"

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