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साक्षात्कार | श्री यशपाल शर्मा, फिल्म अभिनेता

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डी टी यू टाइम्स ने फ़िल्म अभिनेता श्री यशपाल शर्मा का साक्षात्कार लिया, जो इनविक्टस के उद्घाटन समारोह में यहां आए थे।


आप अभिनय की दुनिया की तरफ कैसे आकर्षित हुए? 
आम तौर पर इंसान को एक ही ज़िन्दगी नसीब होती है। एक अभिनेता के रूप में आपको कई जिंदगी जीने का मौका मिलता है, जो भी किरदार आप निभाएं - डॉक्टर, वकील, पुलिस अफ़सर, पं. लक्ष्मीकांत, गंगाधर तिलक जैसे कई चरित्र को मैंने जीया है। एक ही जिंदगी में कई सारी जिन्दगियाँ जीने की संभावना ने अभिनय में काम करने की प्रेरणा दी। 

हमने ऐसा सुना है कि आप बचपन में रामलीला का मंचन करते थे? 
हाँ, बचपन में हम सभी बच्चे मिलकर रामलीला करते थे। खेल-खेल में शुरू किया था लेकिन समय के साथ वह  बड़ा होता गया और लोगों को पसंद भी आने लगा। फिर हम हर वर्ष दशहरा- दिवाली पर मंचन करने लगे व अन्य धार्मिक नाट्य भी करने शुरू कर दिए। लोगों को हँसाने के लिए 'जोकर' भी बना हूँ। फिल्मों में श्याम बेनेगल, सत्यजीत रे जैसे निर्देशकों के काम से काफी प्रभावित हुआ, इनके अलावा नसीरूदीन शाह, ओम पुरी, पंकज कपूर का काम मुझे बहुत अच्छा लगा, फिर दिल्ली के "नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा" में ३ साल का कोर्स किया, इसके बाद कुछ सालों तक थिएटर किया। फिर जो सफर चल पड़ा तो कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा 

आपने जिन अभिनेताओं के साथ काम किया है उनसे क्या सीखने को मिला? 
हर इंसान के अंदर एक बच्चा होता है, वह हर किसी से सीख सकता है, हमें हमेशा उसे जगाए रखना चाहिए। मैंने भी बहुत लोगों से सीखा है, विशेष तौर पर आमिर खान से “लगान” के दौरान अनुशासन और फिल्म मेकिंग सीखने को मिली। इस फिल्म ने आगे चल कर अपने आप में एक मिसाल कायम करी। आमिर हर चीज़ का ध्यान रखते है, सब कुछ परफेक्ट होना चाहिए, हालाँकि परफेक्शन बहुत मुश्किल चीज है, पर वह पूरी कोशिश करते है। 

आपने फिल्म "लगान" के दौरान क्या सीखा, सिर्फ फिल्म के बारे में नहीं बल्कि दैनिक-जीवन के बारे में ? 
"लगान" से यह सीखा कि "काम से समझौता नहीं"। हमने काफी मेहनत और अनुशासन से काम किया था। अगर ६ बजे उठना होता था तो सब ५:५५ तक तैयार रहते थे, पाँच मिनट की भी देरी मंज़ूर नहीं थी। 

नाट्य कला में रुचि रखने वालों को क्या सलाह देना चाहेंगे? बेहतर कलाकारों को उनके स्तर के मंच प्रदान करना कहीं न कहीं मुश्किल होता जा रहा है, जिससे कि उनकी प्रतिभा उभर कर सामने नहीं आ पाती है। ऐसे में आप क्या कहना चाहेंगे? 
मुझे लगता है कि काम करने वाले कहीं भी काम कर सकते हैं। समस्या यह है लोगों ने तो आजकल पढ़ना छोड़ दिया है - साहित्य पढ़ना छोड़ दिया है। अब तो सब कुछ मोबाइल पर ख़त्म हो गया है। पढ़ना बहुत ज़रुरी है, भले आप 1-2 पन्ने ही पढ़िये दिन के, पर पढ़िए ज़रूर। अब तो मोबाइल में किताबें भी आने लगी हैं। पर आजकल लोग सब कुछ छोड़कर फेसबुक और इंस्टाग्राम पर व्यस्त हैं, लाइक्स और कमेंट्स में उलझे हुए हैं। यह कोई रचनात्मक कार्य नहीं है। हमें इस पर परिश्रम करने की जरूरत है, यह सब बातें छात्रों के लिये आवश्यक है। अगर आप में जूनून है, आग है तो दुनिया की कोई ताकत आपको रोक नही सकती, लेकिन यह कहना कि मेरे पास पैसे नही हैं, सुविधाएं नहीं हैं , यह सब बहाने हैं। अच्छा काम करने के ३ तरीके हैं - अभ्यास, अभ्यास और अभ्यास।

Posted by Vishesh

Exasperating farrago