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आदरणीय बापू

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-उमेश सारस्वत, आई. टी. , चतुर्थ वर्ष

आदरणीय बापू,        
आज मन कर रहा है आपसे बात करूं.... आप अगर आज होते तो संभवतः समाज में सद्भावना के गिरते स्तर को आप देख न पाते, आपका अहिंसा का शस्त्र न जानें काल की कौन सी गहराई में जाकर छिप गया है, हिंसा का स्तर लगातार बढ़ते जा रहा है। हर दिशा में केवल दुराचारी और बुरी मानसिकता के लोग अच्छे और सदाचारी लोगों के नैतिक मूल्यों का हनन कर रहे हैं। देश में लोग आपकी अहिंसा की परिभाषा को दुर्बलता से जोड़ रहे है, जिन्हें लगता है कि हिंसा से करवाया गया कार्य उन्हें शौर्यता प्रदान करेगा।

आज आपकी 150वीं जयंती के शुभावसर पर आज़ादी के लगभग 70 वर्ष पहले और अब की इन परिस्थितियों में इतना अंतर मुझे अंदर से कचोटता है, यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या सच में आप इसी आज़ादी का सपना देखते थे, क्या वो लोग जिन्होंने आज़ादी के संघर्ष में आपका साथ दिया इस स्थिति को देखकर खुद पर गर्व करेंगे।

कितने ही दशक बीत गए , कितने ही दशक और बीत जाएंगे... आपके मुल्य , आपकी शिक्षा, आपके संदेश... भावी पीढ़ियों को हमेशा एक मार्गदर्शक की तरह राह दिखाते रहेंगे... जब मनुष्य शांति की और लौटना चाहेगा तो उसके जेहन में आपके विचार सबसे पहले अपनी उपस्थिति दर्ज कराएंगे।

आज आवश्यकता है तो बस लोगो को कुछ सद्भावना के विचारों को सुनने और कहने के साथ-साथ अपने जीवन में उतारने की भी,आज की परिस्थिति को और ज़्यादा दयनीय होने से रोकने के लिए हमें बस गांधी जी के विचारों को दुबारा समझने की जरूरत है, सोचने की जरूरत है कि कैसे बिना किसी शारीरिक शक्ति के प्रयोग से आने वाली मुश्किलों से लड़ा जाता है,कैसे एक सच्चे 'फ़क़ीर' ने देश से इतने शक्तिशाली ब्रिटिशों को बाहर निकलने पर विवश कर दिया...आज आवश्यकता है तो बस मानसिकता बदलने की।

Posted by Priyansh Soni

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