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रामचनर काका 2.0

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-लोकेश नारायण शंकर, आई टी, तृतीया वर्ष

हॉस्टल में बिजली नहीं है पिछले चौबीस घंटों से सिर्फ़ उतनी ही बिजली आई है जितना मेरे गांव में आया करती है दो से चार घंटे की बिजली वह भी बड़ी मुश्किल से। पिछले चौबीस घंटे एक ऐसा अनुभव दे गए जो कई मायने में महत्त्वपूर्ण है। एक अनुभव कहता है कि इतनी भीषण गर्मी में भी बिना बिजली के आप गांव में तो रह सकते हैं पर दिल्ली में बड़ी मुश्किल से गुजारा होगा। ऐसे हालात में आप कुछ खास तो नहीं कर सकते, हाँ पर हर वह खास काम कर सकते हैं जिसमें चार्जिंग की ज़रूरत ना हो। दोस्तों के साथ बिना गैजेट के बैठना जैसे गांव में बरगद के पेड़ के नीचे मस्त खाट बिछा कर बड़े बुजुर्गों के साथ बैठना होता था। 

बरगद के नीचे दो या तीन खाट लगती थी, एक पर रामचनर काका विराजमान होते तो बाकी बचे खाटों पर गांव के बचपन से लेकर पचपन तक की जनता अँधेरा होने तक उन पर सवारी करती, बीच में लोग चढ़ते उतरते रहेंगे पर खाटों की सवारी शाम तक चलेगी ही चलेगी इसकी गारंटी वहीं बरगद पर बैठे काग, कबूतर, तोते और मैने भी दे देते। तब खाटों पर जो ओवरलोडिंग होती थी उसका सोच कर ये ख़याल आ रहा कि नए मोटर व्हीकल एक्ट के जैसा खटिया एक्ट भी होना चाहिए था, जिसमें देश के सभी हिस्सों में खाटों पर होने वाली ओवरलोडिंग के विरुद्ध भारी चलान काटने का प्रावधान होता। अगर ये एक्ट तब लग जाती तो ये लुढ़कती हुई अर्थव्यवस्था पल भर में परपेंडिकुलर हो जाती। पर नहीं, काका के विचार में भिन्नता थी उनके डर से आधुनिकता गांव की चौहद्दी के बिल्कुल करीब नहीं आती थी तभी तो काका ने आजतक उस बरगद के नीचे चबूतरे का निर्माण न होने दिया। 

गांव के लोग काका के इस सोच से भलीभाँति परिचित हैं, हो भी क्यों नहीं गांव में बिजली लाने के विरोध में काका ने जो हुड़दंग मचाई थी वह सबके नज़रिये से ग़लत थी पर उनका कहना था कि बिजली आने के बाद लोग घरों में दुबके रहेंगे, मिलना-जुलना कम हो जाएगा, आने वाली पीढ़ी कम मिलनसार होगी क्योंकि नई पीढ़ी ने तो देखा ही नहीं न कि बरगद के नीचे चौपाल भी लगती है। उस नए पीढ़ी को ये कहाँ मालूम होगा कि टेलीविजन रोज नहीं बल्कि सप्ताह में सिर्फ़ रविवार को सुबह साढ़े नौ बजे देखना होता है। (एक दौर था जब साढ़े नौ बजे पर रामायण देखने के लिए पूरा देश इस एक घंटे के लिए थम—सा जाता था) । उस नए पीढ़ी को घर के बाहर के रिश्तों का अनुभव और अहमियत का अंदाजा नहीं होगा, व्यक्तित्व में सभ्यता-संस्कृति के कुछ अंश ही रह जाएँगे। ऐसे ही कई तीर थे काका के तरकस में जो रामचनर काका के विरोध को निर्विरोध रखने के लिए गांव वालों को बाध्य कर रहे थे। 

गांव वालों की अगली पीढ़ी से होने के नाते मेरा फ़र्ज़ बनता है कि आप सबको बताएँ कि-'काका आपने जो कुछ भी कहा था, वह आज की वास्तविकता है'। मेरे उम्र का हर इंसान छत के नीचे रहने लगा है, आधुनिकता अब इस कदर हावी हो चुकी है जितनी तब प्राचीनता थी और नहीं तो इस आधुनिकता में दिखावा, तर्कहीनता और सबसे महत्त्वपूर्ण अज्ञानता ज़्यादा है। 

काका को डर था कि हम आधुनिक बनने के चक्कर में ओछी आधुनिकता अपना लेंगे, इन सब बातों से काका ही नहीं उनके बुजुर्ग भी आशंकित थे तभी तो आधुनिकता की बीज पड़ने के दौर में ही 'वेदों की ओर लौटने के लिए' महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने ओछी अधुनिकता से दूर सच्ची आधुनिकता को अपनाने पर जोर दिया था।

फिलहाल होस्टल में बिजली वापस आ गयी है, रामचनर काका को अलविदा कहने का वक्त भी आ गया है।  जैसा आप लोग सोच रहे होंगे बिजली आयी है तो लैपटॉप और फ़ोन भी चार्जिंग पर लगाओ भई, सारी अधुनिकता तो आजकल इधर से ही आ रही है।

Posted by Vishesh

Exasperating farrago